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mahabharat 1.52.10: छोटे-बड़े, नाना रंगों वाले, भयंकर विष वाले, देखने में भयंकर, सर्प के समान मोटे, बिना कारण ही डसने वाले और अत्यन्त बलवान, अनेक सर्प अपनी माता के शाप से पीड़ित होकर अग्नि में गिर रहे थे॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.52: सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 52: सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.52.10 
उच्चावचाश्च बहवो नानावर्णा विषोल्बणा:।
घोराश्च परिघप्रख्या दन्दशूका महाबला:।
प्रपेतुरग्नावुरगा मातृवाग्दण्डपीडिता:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
छोटे-बड़े, नाना रंगों वाले, भयंकर विष वाले, देखने में भयंकर, सर्प के समान मोटे, बिना कारण ही डसने वाले और अत्यन्त बलवान, अनेक सर्प अपनी माता के शाप से पीड़ित होकर अग्नि में गिर रहे थे॥10॥
 
Numerous serpents, large and small, of many colours, having deadly poison, fearsome to look at, as thick as a snake, capable of biting without any reason and extremely powerful, were themselves falling into the fire, suffering from their mother's curse.॥10॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)