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mahabharat 1.51.8: साधुशिरोमणि! ऋत्विजों की यह बात सुनकर जनमेजय ऋषि को विश्वास हो गया कि अब तक्षक अवश्य ही प्रज्वलित अग्नि के मुख में गिरकर नष्ट हो जाएगा॥8॥   |   mahabharat अध्याय 1.51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.51.8 
एवमुक्त: स राजर्षिर्मेने दग्धं हि तक्षकम्।
हुताशनमुखे दीप्ते प्रविष्टमिति सत्तम॥ ८॥
 
 
अनुवाद
साधुशिरोमणि! ऋत्विजों की यह बात सुनकर जनमेजय ऋषि को विश्वास हो गया कि अब तक्षक अवश्य ही प्रज्वलित अग्नि के मुख में गिरकर नष्ट हो जाएगा॥8॥
 
Sadhushiromane! On hearing this from the Ritvijas, the sage Janmejaya became confident that now Takshak will surely be destroyed by falling into the mouth of the blazing fire. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)