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mahabharat 1.51.3-5: 'ब्राह्मणों! मैं अपने पिता के वध करने वाले दुष्ट तक्षक से बदला लेना चाहता हूँ। कृपया मुझे बताइए कि इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए। क्या आप लोग ऐसा कोई कर्म जानते हैं जिससे मैं तक्षक नाग को उसके बन्धुओं सहित जलती हुई अग्नि में डाल सकूँ? जिस प्रकार उसने पूर्वकाल में मेरे पिता को अपनी विषैली अग्नि से जला दिया था, उसी प्रकार मैं भी उस पापी नाग को जलाकर भस्म कर देना चाहता हूँ।'॥3-5॥   |   mahabharat अध्याय 1.51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम  »  श्लोक 3-5
 
 
श्लोक  1.51.3-5 
यो मे हिंसितवांस्तातं तक्षक: स दुरात्मवान्॥ ३॥
प्रतिकुर्यां तथा तस्य तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे।
अपि तत् कर्म विदितं भवतां येन पन्नगम्॥ ४॥
तक्षकं सम्प्रदीप्तेऽग्नौ प्रक्षिपेयं सबान्धवम्।
यथा तेन पिता मह्यं पूर्वं दग्धो विषाग्निना।
तथाहमपि तं पापं दग्धुमिच्छामि पन्नगम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'ब्राह्मणों! मैं अपने पिता के वध करने वाले दुष्ट तक्षक से बदला लेना चाहता हूँ। कृपया मुझे बताइए कि इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए। क्या आप लोग ऐसा कोई कर्म जानते हैं जिससे मैं तक्षक नाग को उसके बन्धुओं सहित जलती हुई अग्नि में डाल सकूँ? जिस प्रकार उसने पूर्वकाल में मेरे पिता को अपनी विषैली अग्नि से जला दिया था, उसी प्रकार मैं भी उस पापी नाग को जलाकर भस्म कर देना चाहता हूँ।'॥3-5॥
 
‘Brahmins! I want to take revenge from the evil-minded Takshak who killed my father. Please tell me what I should do for this. Do you know any such action by which I can throw Takshak snake along with his relatives into the burning fire? Just as he had burnt my father with his poisonous fire in the past, in the same way I also want to burn that sinful snake to ashes.’॥ 3-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)