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mahabharat 1.51.17: यह सुनकर राजा जनमेजय ने दीक्षा लेने से पहले अपने सेवक को आदेश दिया कि, "मुझे बताए बिना किसी भी अजनबी को यज्ञवेदी में प्रवेश न करने दिया जाए।" ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 51: जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.51.17 
एतच्छ्रुत्वा तु राजासौ प्राग्दीक्षाकालमब्रवीत्।
क्षत्तारं न हि मे कश्चिदज्ञात: प्रविशेदिति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर राजा जनमेजय ने दीक्षा लेने से पहले अपने सेवक को आदेश दिया कि, "मुझे बताए बिना किसी भी अजनबी को यज्ञवेदी में प्रवेश न करने दिया जाए।" ॥17॥
 
On hearing this, King Janamejaya, before taking initiation, instructed his servant, "No stranger should be allowed to enter the sacrificial altar without informing me." ॥17॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमसम्बन्धी इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)