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mahabharat 1.49.30: हे भरतश्रेष्ठ! उन्होंने भूमि पर पड़े हुए एक मरे हुए सर्प को अपने धनुष की नोक से उठाकर उस शुद्धहृदय वाले मुनि के कंधे पर रख दिया।   |   mahabharat अध्याय 1.49: राजा परीक्षित् के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 49: राजा परीक्षित् के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.49.30 
मृतं सर्पं धनुष्कोटॺा समुत्क्षिप्य धरातलात् ।
तस्य शुद्धात्मन: प्रादात् स्कन्धे भरतसत्तम॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! उन्होंने भूमि पर पड़े हुए एक मरे हुए सर्प को अपने धनुष की नोक से उठाकर उस शुद्धहृदय वाले मुनि के कंधे पर रख दिया।
 
O best of the Bharatas! He picked up a dead snake lying on the ground with the tip of his bow and placed it on the shoulder of that pure-hearted sage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)