Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.48.7: यह जानते हुए कि आपके महातपस्वी पति को जाने से रोकना किसी के लिए भी कठिन है, मैं उन्हें वापस लाने के लिए उनके पीछे नहीं जा रही हूँ। यदि मैं उनसे वापस आने का आग्रह करूँगी, तो सम्भव है कि वे मुझे शाप भी दे दें ॥7॥ | mahabharat अध्याय 1.48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
दुर्वार्यतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विन:।
नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत् स माम्॥ ७॥
अनुवाद
यह जानते हुए कि आपके महातपस्वी पति को जाने से रोकना किसी के लिए भी कठिन है, मैं उन्हें वापस लाने के लिए उनके पीछे नहीं जा रही हूँ। यदि मैं उनसे वापस आने का आग्रह करूँगी, तो सम्भव है कि वे मुझे शाप भी दे दें ॥7॥
Knowing that it is very difficult for anyone to stop your great ascetic husband from going, I am not following him to bring him back. If I insist him to come back, perhaps he may even curse me. ॥ 7॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥