श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.48.4 
स सर्पसत्रात् किल नो मोक्षयिष्यति वीर्यवान्।
एवं पितामह: पूर्वमुक्तवांस्तु सुरै: सह॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वह बलवान ऋषिपुत्र हम लोगों को जनमेजय के सर्पयज्ञ में जलने से बचाएगा; यह बात ब्रह्माजी ने पहले ही देवताओं से कह दी थी॥4॥
 
That powerful son of the sage will save us from being burnt in the snake sacrifice of Janamejaya; this was told earlier by Lord Brahma to the gods. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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