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mahabharat 1.48.3: वासुकि बोले - हे प्रिये! तुम सर्पों के महान कार्य और ऋषि से अपने विवाह के उद्देश्य को जानती हो। यदि तुम्हारे गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो तो सर्पों का बहुत कल्याण होगा।   |   mahabharat अध्याय 1.48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.48.3 
वासुकिरुवाच
जानासि भद्रे यत् कार्यं प्रदाने कारणं च यत्।
पन्नगानां हितार्थाय पुत्रस्ते स्यात् ततो यदि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वासुकि बोले - हे प्रिये! तुम सर्पों के महान कार्य और ऋषि से अपने विवाह के उद्देश्य को जानती हो। यदि तुम्हारे गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो तो सर्पों का बहुत कल्याण होगा।
 
Vasuki said - O dear! You know the great work of the snakes and the purpose of your marriage with the sage. If a son was born from your womb, it would be of great benefit to the snakes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)