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mahabharat 1.48.21-22: बुद्धिमान आस्तिक अमित बाल्यकाल में ही वहीं रहकर ब्रह्मचर्य का पालन और धर्म करने लगा। नागराज के घर में उसका पालन-पोषण बड़े यत्न से हुआ। सुवर्ण के समान कान्तिमान और भगवान शिव के समान स्वरूप वाला वह बालक दिन-प्रतिदिन समस्त नागों के हर्ष को बढ़ाने लगा। 21-22॥   |   mahabharat अध्याय 1.48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  1.48.21-22 
स बाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितबुद्धिमान्।
गृहे पन्नगराजस्य प्रयत्नात् परिरक्षित:॥ २१॥
भगवानिव देवेश: शूलपाणिर्हिरण्मय:।
विवर्धमान: सर्वांस्तान् पन्नगानभ्यहर्षयत्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान आस्तिक अमित बाल्यकाल में ही वहीं रहकर ब्रह्मचर्य का पालन और धर्म करने लगा। नागराज के घर में उसका पालन-पोषण बड़े यत्न से हुआ। सुवर्ण के समान कान्तिमान और भगवान शिव के समान स्वरूप वाला वह बालक दिन-प्रतिदिन समस्त नागों के हर्ष को बढ़ाने लगा। 21-22॥
 
Amit, an intelligent believer, stayed there in his childhood and started following celibacy and practicing religion. He was carefully brought up and brought up in the house of Nagaraj. That child, who was shining like gold and was like Lord Shiva, started increasing the joy of all the snakes day by day. 21-22॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आस्तीकोत्पत्तौ अष्टचत्वा रिंशोऽध्याय:॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीककी उत्पत्तिविषयक

अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)