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mahabharat 1.48.14: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! यह सुनकर सर्पराज वासुकि ने बड़ी प्रसन्नता से कहा - 'ऐसा ही हो।' इस प्रकार उन्होंने विश्वासपूर्वक अपनी बहन की बात स्वीकार कर ली।   |   mahabharat अध्याय 1.48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 48: वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.48.14 
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकि: परया मुदा।
एवमस्त्विति तद् वाक्यं भगिन्या: प्रत्यगृह्णत॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! यह सुनकर सर्पराज वासुकि ने बड़ी प्रसन्नता से कहा - 'ऐसा ही हो।' इस प्रकार उन्होंने विश्वासपूर्वक अपनी बहन की बात स्वीकार कर ली।
 
Ugrashravaji says - Shaunak! On hearing this, the king of snakes Vasuki said very happily - 'So be it'. In this way, he accepted his sister's words with confidence. 14.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)