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श्लोक 1.47.41  |
एवमुक्तस्तु स मुनिर्भार्यां वचनमब्रवीत् ।
यद् युक्तमनुरूपं च जरत्कारुं तपोधन:॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| यह सुनकर तपस्वी ॠषि ने अपनी पत्नी जरत्कारु से इस अवसर के लिए जो उचित और उपयुक्त था, वह कहा - ॥41॥ |
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| On hearing this the ascetic sage said to his wife Jaratkaru what was appropriate and suitable for the occasion - ॥ 41॥ |
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