श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.47.4 
सौतिरुवाच
प्रतिश्रुते तु नागेन भरिष्ये भगिनीमिति।
जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - नागराज ने यह शर्त स्वीकार कर ली कि ‘मैं अपनी बहन का भरण-पोषण करूँगा।’ तब जरत्कारु मुनि वासुकि के महल में गए।
 
Ugrashravaji says - The King of Snakes accepted the condition that 'I will provide for my sister.' Then Jaratkaru Muni went to Vasuki's palace.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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