| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन » श्लोक 33-38 |
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| | | | श्लोक 1.47.33-38  | इत्युक्ता सानवद्याङ्गी प्रत्युवाच मुनिं तदा।
जरत्कारुं जरत्कारुश्चिन्ताशोकपरायणा॥ ३३॥
बाष्पगद्गदया वाचा मुखेन परिशुष्यता।
कृताञ्जलिर्वरारोहा पर्यश्रुनयना तत:॥ ३४॥
धैर्यमालम्ब्य वामोरुर्हृदयेन प्रवेपता।
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम्॥ ३५॥
धर्मे स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रियहिते रताम्।
प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम॥ ३६॥
तदलब्धवतीं मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुकि:।
मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम॥ ३७॥
अपत्यमीप्सितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते।
त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत्॥ ३८॥ | | | | | | अनुवाद | | यह सुनकर सुन्दरी जरत्कारु अपने भाई के कार्य के लिए चिन्तित हो गयी और पति वियोग के शोक में डूब गयी। उसका मुख सूख गया, आँखों में आँसू भर आये और हृदय काँपने लगा। तब किसी प्रकार धैर्य समेटकर सुन्दर जंघाओं और मनोहर शरीर वाली वह नागकन्या हाथ जोड़कर रुँधे हुए स्वर में जरत्कारु मुनि से बोली - 'धर्मज्ञान! आप सदैव धर्म में स्थित रहें। मैं भी पत्नी धर्म में स्थित हूँ और सदैव अपने प्रियतम के हित में तत्पर रहूँगी। आप मुझ निरपराध और अबला स्त्री का त्याग न करें। ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैं अभागिनी उस उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकी, जिसके लिए मेरे भाई ने मेरा विवाह आपके साथ किया था। नागराज वासुकि मुझसे क्या कहेंगे? हे मुनि! मेरे सम्बन्धी मेरी माता के शाप से बोझिल हैं। वे मुझसे सन्तान चाहते थे, परन्तु अब तक नहीं देख सके। यदि मुझे आपसे पुत्र प्राप्त हो जाये, तो उसके द्वारा मेरे कुल के बंधुओं का कल्याण हो सकता है।' | | | | On hearing this, the beautiful Jaratkaru got worried about her brother's work and was drowned in the grief of separation from her husband. Her mouth dried up, tears welled up in her eyes and her heart started trembling. Then somehow gathering her composure, that serpent girl with beautiful thighs and a charming body, with folded hands, spoke to Jaratkaru Muni in a choked voice - 'Dharmagyan! You are always established in Dharma. I too am established in the Dharma of a wife and will always be engaged in the welfare of my beloved. You should not abandon me, an innocent and helpless woman. Best of Brahmins! I, the unfortunate one, have not been able to achieve the purpose for which my brother married me to you. What will Nagraj Vasuki say to me? O great sage! My relatives are burdened by the curse of my mother. They wanted to have a child from me, but have not seen that till now. If I get a son from you, then my brothers of the caste can be benefited through him. 33–38. | | ✨ ai-generated | | |
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