श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 25-27h
 
 
श्लोक  1.47.25-27h 
समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम्।
शक्तिरस्ति न वामोरु मयि सुप्ते विभावसो:॥ २५॥
अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हृदि वर्तते।
न चाप्यवमतस्येह वासो रोचेत कस्यचित्॥ २६॥
किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा।
 
 
अनुवाद
'इसलिए मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा। जिस मार्ग से आया था, उसी मार्ग से चला जाऊँगा। वामोरु! सूर्य में इतनी शक्ति नहीं कि वह मुझे डूबते समय सोने दे। मेरे हृदय में ऐसा विश्वास है। जिस व्यक्ति का कहीं अपमान होता है, वह वहाँ रहना पसन्द नहीं करता। फिर मेरा या मेरे जैसे किसी अन्य धर्मात्मा का क्या होगा?'॥25-26 1/2॥
 
‘That is why I will not stay with you anymore. I will go away the same way I came. Vaamoru! The sun does not have the strength to let me sleep while it sets. I have this conviction in my heart. A person who is insulted somewhere does not like to stay there. Then what about me or any other righteous person like me?’॥25-2 6 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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