श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  1.47.22-23h 
संध्यामुपास्स्व भगवन्नप: स्पृ ष् ट्वा यतव्रत:।
प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽयं मुहूर्तो रम्यदारुण:॥ २२॥
संध्या प्रवर्तते चेयं पश्चिमायां दिशि प्रभो।
 
 
अनुवाद
'प्रभो! आप संयमपूर्वक जल पीएँ और संध्याओपासना करें। अब अग्निहोत्र का समय है। यह मुहूर्त अत्यंत सुखद प्रतीत होता है, क्योंकि यह धर्म का साधन है। इस समय भूत-प्रेत आदि जीव-जंतु विचरण करते हैं, इसलिए यह डरावना भी है। प्रभु! पश्चिम दिशा में संध्या दिखाई दे रही है - वहाँ का आकाश लाल हो रहा है।'॥22 1/2॥
 
‘Lord! You should sip water with restraint and perform Sandhyaopasana. Now it is time for Agnihotra. This Muhurta seems to be very pleasant because it is a means of Dharma. Ghosts and other creatures roam around in this time, hence it is also scary. Prabhu! Sandhya is appearing in the west direction - the sky there is turning red.'॥ 22 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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