श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  1.47.20-21 
इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजङ्गमा।
तमृषिं दीप्ततपसं शयानमनलोपमम्॥ २०॥
उवाचेदं वच: श्लक्ष्णं ततो मधुरभाषिणी।
उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति॥ २१॥
 
 
अनुवाद
मन में ऐसा निश्चय करके मधुरभाषी नागकन्या जरत्कारु ने वहाँ सोये हुए अग्नि के समान तेजस्वी और प्रखर तपस्वी ऋषि से मधुर वाणी में कहा - 'हे महामुन! उठो, सूर्यदेव अस्त हो रहे हैं।
 
Having made such a determination in her mind, the sweet-spoken serpent girl Jaratkaru said in sweet words to the sage sleeping there who was as radiant as a fire and an intense ascetic - 'O great one! Get up, the Sun God is setting.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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