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mahabharat 1.47.18-19: "यदि मैं उसे जगा दूँ, तो वह मुझ पर अवश्य ही क्रोधित होगा और यदि मेरे सोते समय संध्याओपासना का समय बीत जाए, तो उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाएगा। ऐसी स्थिति में मुझे धर्मात्मा पति का क्रोध स्वीकार करना चाहिए या उसका धर्म नष्ट करना चाहिए? इन दोनों में से धर्म का नष्ट होना अधिक कठिन प्रतीत होता है।" अतः उसने ऐसा करने का निश्चय किया, जिससे उसके धर्म का क्षय न हो॥18-19॥   |   mahabharat अध्याय 1.47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  1.47.18-19 
कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथवा पुन:।
धर्मलोपो गरीयान् वै स्यादित्यत्राकरोन्मतिम्॥ १८॥
उत्थापयिष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति।
धर्मलोपो भवेदस्य संध्यातिक्रमणे ध्रुवम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
"यदि मैं उसे जगा दूँ, तो वह मुझ पर अवश्य ही क्रोधित होगा और यदि मेरे सोते समय संध्याओपासना का समय बीत जाए, तो उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाएगा। ऐसी स्थिति में मुझे धर्मात्मा पति का क्रोध स्वीकार करना चाहिए या उसका धर्म नष्ट करना चाहिए? इन दोनों में से धर्म का नष्ट होना अधिक कठिन प्रतीत होता है।" अतः उसने ऐसा करने का निश्चय किया, जिससे उसके धर्म का क्षय न हो॥18-19॥
 
"If I wake him up, he will surely get angry with me and if the time for Sandhyaopasana passes while I am still sleeping, then his Dharma will surely be lost. In such a situation, should I accept the anger of a virtuous husband or should I lose his Dharma? Of the two, loss of Dharma seems to be more difficult." So she decided to do that which would not lead to the loss of his Dharma.॥ 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)