श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.47.14-15 
शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव स:।
तत: कतिपयाहस्य जरत्कारुर्महायशा:॥ १४॥
उत्सङ्गेऽस्या: शिर: कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत्।
तस्मिंश्च सुप्ते विप्रेन्द्रे सवितास्तमियाद् गिरिम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जैसे शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा बढ़ता है, उसी प्रकार गर्भ भी दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। कुछ दिनों के पश्चात् महातपस्वी जरत्कारु कुछ दुःखी होकर अपनी पत्नी की गोद में सिर रखकर सो गए। उस महाब्राह्मण जरत्कारु के सोते समय सूर्य अस्त होने लगा॥ 14-15॥
 
Just as the moon grows in the Shukla paksha, similarly the womb also started growing day by day. After some days, the great ascetic Jaratkaru became somewhat sad and went to sleep with his head on his wife's lap. The sun started setting while that great Brahmin Jaratkaru was sleeping.॥ 14-15॥
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