श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 47: जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.47.1-2 
सौतिरुवाच
वासुकिस्त्वब्रवीद् वाक्यं जरत्कारुमृषिं तदा।
सनाम्नी तव कन्येयं स्वसा मे तपसान्विता॥ १॥
भरिष्यामि च ते भार्यां प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम।
रक्षणं च करिष्येऽस्या: सर्वशक्त्या तपोधन।
त्वदर्थं रक्ष्यते चैषा मया मुनिवरोत्तम॥ २॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनक! उस समय वासुकि ने जरत्कारु मुनि से कहा- 'हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! इस कन्या का नाम आपके ही समान है। यह मेरी बहन है और आपकी ही तरह तपस्विनी है। कृपया इसे स्वीकार करें। मैं आपकी पत्नी का पालन-पोषण करूँगा। हे तपस्वी! मैं अपनी पूरी शक्ति से इसकी रक्षा करूँगा। हे मुनि! मैंने अब तक आपके लिए ही इसकी रक्षा की है।॥1-2॥
 
Ugrasravaji says- Shaunak! At that time Vasuki said to Jaratkaru Muni- 'O great Brahmin! This girl has the same name as yours. She is my sister and is an ascetic like you. Please accept her. I will take care of your wife. O ascetic! I will protect her with all my might. O great sage! I have protected her till now only for you.॥ 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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