Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.45.3-4: वे ऋषिगण वायु पीते थे और निराहार रहते थे; इसलिए वे दिन-प्रतिदिन सूखते जा रहे थे। एक दिन उन्होंने पितरों को देखा, जो एक गड्ढे में मुँह के बल लटके हुए थे। उनके हाथ में खस नामक तिनकों का एक गुच्छा था, जिसकी जड़ में केवल एक रेशा शेष था। उस बचे हुए रेशे को भी उसी बिल में रहने वाला एक चूहा धीरे-धीरे खा रहा था। | mahabharat अध्याय 1.45: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वायुभक्षो निराहार: शुष्यन्नहरहर्मुनि:।
स ददर्श पितॄन् गर्ते लम्बमानानधोमुखान्॥ ३॥
एकतन्त्ववशिष्टं वै वीरणस्तम्बमाश्रितान्।
तं तन्तुं च शनैराखुमाददानं बिलेशयम्॥ ४॥
अनुवाद
वे ऋषिगण वायु पीते थे और निराहार रहते थे; इसलिए वे दिन-प्रतिदिन सूखते जा रहे थे। एक दिन उन्होंने पितरों को देखा, जो एक गड्ढे में मुँह के बल लटके हुए थे। उनके हाथ में खस नामक तिनकों का एक गुच्छा था, जिसकी जड़ में केवल एक रेशा शेष था। उस बचे हुए रेशे को भी उसी बिल में रहने वाला एक चूहा धीरे-धीरे खा रहा था।
Those sages used to drink air and remain without food; hence they kept on drying up day by day. One day they saw the Pitris, who were hanging face down in a pit. They were holding a bunch of straws called Khas, from whose root only one fiber was left. That remaining fiber was also being slowly eaten by a rat living in the same hole. 3-4.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥