Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.45.28-34: 'साधुशिरोमणि! उस जरत्कारु की तपस्या हमें इस संकट से नहीं बचा सकेगी। देखो, हमारी जड़ें कट गई हैं, काल ने हमारी चेतना को नष्ट कर दिया है और हम अपने स्थान से इस गड्ढे में गिर रहे हैं। जैसे पापियों को कष्ट होता है, वैसा ही हमारा भी होगा। जब हम अपने समस्त बन्धु-बान्धवों सहित इस गड्ढे में गिरेंगे, तब वह जरत्कारु भी काल का ग्रास बनकर इस नरक में गिरेगा। पितामह! तप, यज्ञ या अन्य महान् एवं पवित्र साधन संतान के समान नहीं हैं। पितामह! आप तपस्वी प्रतीत होते हैं। यदि आपकी भेंट तपस्वी जरत्कारु से हो, तो उन्हें हमारा संदेश सुनाइए और जो कुछ आपने यहाँ देखा है, वह सब उनसे कहिए! ब्रह्मन्! हमारा पालन करने की दृष्टि से आप जरत्कारु से इस प्रकार बात कीजिए कि वह एक पत्नी प्राप्त कर लें और उसके द्वारा पुत्रों को जन्म दें। पितामह! हम जरत्कारु के बन्धु-बान्धवों को अपने ही भाई-बन्धु के समान मान रहे हैं। अतः हे महामुनि! मुझे बताइए कि आप कौन हैं? यहाँ खड़े हम सब लोगों में आप किसके सदृश हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं ॥28-34॥ | mahabharat अध्याय 1.45: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
'साधुशिरोमणि! उस जरत्कारु की तपस्या हमें इस संकट से नहीं बचा सकेगी। देखो, हमारी जड़ें कट गई हैं, काल ने हमारी चेतना को नष्ट कर दिया है और हम अपने स्थान से इस गड्ढे में गिर रहे हैं। जैसे पापियों को कष्ट होता है, वैसा ही हमारा भी होगा। जब हम अपने समस्त बन्धु-बान्धवों सहित इस गड्ढे में गिरेंगे, तब वह जरत्कारु भी काल का ग्रास बनकर इस नरक में गिरेगा। पितामह! तप, यज्ञ या अन्य महान् एवं पवित्र साधन संतान के समान नहीं हैं। पितामह! आप तपस्वी प्रतीत होते हैं। यदि आपकी भेंट तपस्वी जरत्कारु से हो, तो उन्हें हमारा संदेश सुनाइए और जो कुछ आपने यहाँ देखा है, वह सब उनसे कहिए! ब्रह्मन्! हमारा पालन करने की दृष्टि से आप जरत्कारु से इस प्रकार बात कीजिए कि वह एक पत्नी प्राप्त कर लें और उसके द्वारा पुत्रों को जन्म दें। पितामह! हम जरत्कारु के बन्धु-बान्धवों को अपने ही भाई-बन्धु के समान मान रहे हैं। अतः हे महामुनि! मुझे बताइए कि आप कौन हैं? यहाँ खड़े हम सब लोगों में आप किसके सदृश हैं? हम आपका परिचय सुनना चाहते हैं ॥28-34॥
‘Sadhushiromane! That Jaratkaru's penance will not save us from this crisis. See, our roots have been cut off, time has destroyed our consciousness and we are falling down from our place into this pit. Just as sinners suffer, so will be our fate. When we fall into this pit along with all our friends and relatives, then that Jaratkaru will also fall into this hell, becoming the prey of time. Father! Penance, sacrifices or other great and holy means are not equal to children. Father! You seem to be rich in penance. If you meet the ascetic Jaratkaru, then convey our message to him and tell him everything that you have seen here! Brahman! With a view to taking care of us, you should talk to Jaratkaru in such a way that he gets a wife and gives birth to sons through her. Father! We, the relatives of Jaratkaru, are treating us like our own brothers and relatives. So, O great sage! Tell me who you are? Who do you resemble among all of us who are standing here? We want to hear your introduction.'॥ 28-34॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुपितृदर्शने पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जरत्कारुके पितृदर्शनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥