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mahabharat 1.45.22: 'जरतकार! तुम्हारे पितर बड़े दुःखी हैं और गड्ढे में मुँह के बल लटके हुए हैं। तुम्हें उत्तम प्रकार से स्त्री का विवाह करना चाहिए और उससे सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 1.45: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 45: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.45.22 
पितरस्तेऽवलम्बन्ते गर्ते दीना अधोमुखा:।
साधु दारान् कुरुष्वेति प्रजामुत्पादयेति च॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'जरतकार! तुम्हारे पितर बड़े दुःखी हैं और गड्ढे में मुँह के बल लटके हुए हैं। तुम्हें उत्तम प्रकार से स्त्री का विवाह करना चाहिए और उससे सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए॥ 22॥
 
'Jaratkaar! Your forefathers are very miserable and are hanging face down in the pit. You should marry a wife in the best manner and produce children through her.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)