श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 45: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.45.18 
अस्ति त्वेकोऽद्य नस्तन्तु: सोऽपि नास्ति यथा तथा।
मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एकं समास्थित:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
आजकल हमारे वंश में केवल एक ही सूत या सन्तान बची है, परन्तु वह भी लगभग नगण्य है। हम अल्प भाग्यवान हैं, इसीलिए वह अभागी सन्तान केवल तपस्या में ही लगी रहती है॥18॥
 
Nowadays, only one thread or progeny is left in our lineage, but even that is almost negligible. We are less fortunate, that is why that unfortunate progeny is engaged only in penance.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)