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mahabharat 1.45.12: पितरों ने कहा - हे ब्राह्मण! आप वृद्ध ब्रह्मचारी हैं, जो हमारी रक्षा करना चाहते हैं; किन्तु हमारे संकट तपस्या से नहीं टल सकते।   |   mahabharat अध्याय 1.45: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 45: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.45.12 
पितर ऊचु:
वृद्धो भवान् ब्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छसि।
न तु विप्राग्रॺ तपसा शक्यते तद् व्यपोहितुम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
पितरों ने कहा - हे ब्राह्मण! आप वृद्ध ब्रह्मचारी हैं, जो हमारी रक्षा करना चाहते हैं; किन्तु हमारे संकट तपस्या से नहीं टल सकते।
 
The ancestors said - O Brahmin! You are an old brahmacari who wants to protect us here; but our troubles cannot be averted by penance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)