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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 43: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना  »  श्लोक 34-36
 
 
श्लोक  1.43.34-36 
ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिण: कालचोदिता:।
एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संनिवेश्य ह॥ ३४॥
कृमिकं प्राहसत् तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतन:।
प्रहसन्नेव भोगेन तक्षकेण त्ववेष्टॺत॥ ३५॥
तस्मात् फलाद् विनिष्क्रम्य यत् तद् राज्ञे निवेदितम्।
वेष्टयित्वा च वेगेन विनद्य च महास्वनम्।
अदशत् पृथिवीपालं तक्षक: पन्नगेश्वर:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
काल की प्रेरणा से मंत्रिगण भी उनकी बात से सहमत हो गए। मंत्रियों से यह कहकर, राजराज परीक्षित ने उस छोटे से कीड़े को अपने कंधे पर रख लिया और जोर-जोर से हंसने लगे। वह तत्काल मरने वाले थे, इसलिए उन्होंने अपनी सुध-बुध खो दी थी। राजा अभी हंस ही रहे थे कि तभी तक्षक सर्प ने उन्हें अर्पित किए गए फल से निकलकर उनके शरीर में लिपटा लिया। सर्पराज तक्षक ने इतनी तेजी से उनके शरीर को लपेटकर, जोर से दहाड़कर राजा परीक्षित को डस लिया।
 
Inspired by time, the ministers also agreed with him. Having said the above to the ministers, the King of Kings Parikshit put the small insect on his shoulder and started laughing loudly. He was going to die immediately; hence he had lost his senses. The king was still laughing when Takshak snake came out of the fruit that was offered to him and entangled him with his body. Having wrapped himself around his body with such speed, the King of Snakes Takshak roared loudly and bit the King Parikshit.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि तक्षकदंशे त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें तक्षक-दंशनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)