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mahabharat 1.43.32: राजा परीक्षित ने सर्प को हाथ में लेकर अपने मंत्रियों से कहा, 'सूर्य अब पश्चिम में अस्त हो रहा है, अतः इस समय मुझे सर्प विष का कोई भय नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 1.43: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 43: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.43.32 
स तं गृह्य नृ प श्रेष्ठ: सचिवानिदमब्रवीत् ।
अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
राजा परीक्षित ने सर्प को हाथ में लेकर अपने मंत्रियों से कहा, 'सूर्य अब पश्चिम में अस्त हो रहा है, अतः इस समय मुझे सर्प विष का कोई भय नहीं है।
 
The great king Parikshit took the insect in his hand and addressed his ministers, 'The Sun is now setting in the west; therefore, at this time I have no fear of snake venom.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)