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mahabharat 1.43.22-24h: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! तब तक्षक ने सोचा, मुझे माया का सहारा लेकर राजा को ठगना चाहिए; परन्तु इसका उपाय क्या है? तत्पश्चात तक्षक नाग ने फल, दर्भ (कुशा) और जल लेकर कुछ सर्पों को तपस्वी वेश में राजा के पास जाने का आदेश दिया।   |   mahabharat अध्याय 1.43: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 43: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना  »  श्लोक 22-24h
 
 
श्लोक  1.43.22-24h 
सौतिरुवाच
स चिन्तयामास तदा मायायोगेन पार्थिव:॥ २२॥
मया वञ्चयितव्योऽसौ क उपायो भवेदिति।
ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत् स भुजङ्गमान्॥ २३॥
फलदर्भोदकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षक:।
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! तब तक्षक ने सोचा, मुझे माया का सहारा लेकर राजा को ठगना चाहिए; परन्तु इसका उपाय क्या है? तत्पश्चात तक्षक नाग ने फल, दर्भ (कुशा) और जल लेकर कुछ सर्पों को तपस्वी वेश में राजा के पास जाने का आदेश दिया।
 
Ugrashravaji says - Shaunakji! Then Takshak thought, I should take recourse to Maya and cheat the king; but what is the way to do this? Thereafter Takshak snake took fruits, Darbha (Kusha) and water and ordered some snakes to go to the king in the guise of ascetics.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)