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mahabharat 1.43.14: हे ब्राह्मण! महाराज परीक्षित एक ब्राह्मण के शाप से तिरस्कृत हो चुके हैं और उनका जीवन भी समाप्त हो चुका है। ऐसी स्थिति में उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयत्न से तुम्हें सफलता मिलेगी, इसमें संदेह है। 14.   |   mahabharat अध्याय 1.43: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 43: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित् के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.43.14 
विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे।
घटमानस्य ते विप्र सिद्धि: संशयिता भवेत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! महाराज परीक्षित एक ब्राह्मण के शाप से तिरस्कृत हो चुके हैं और उनका जीवन भी समाप्त हो चुका है। ऐसी स्थिति में उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयत्न से तुम्हें सफलता मिलेगी, इसमें संदेह है। 14.
 
'O Brahmin! Maharaja Parikshit is despised by the curse of a Brahmin and his life has also come to an end. In such a situation, it is doubtful whether you will achieve success by trying to revive him. 14.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)