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mahabharat 1.42.8: क्रोध साधकों द्वारा अर्जित धर्म को बड़ी पीड़ा से नष्ट कर देता है। फिर धर्म से रहित मनुष्य अभीष्ट गति को प्राप्त नहीं करते। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 1.42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.42.8 
क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दु:खसंचितम्।
ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
क्रोध साधकों द्वारा अर्जित धर्म को बड़ी पीड़ा से नष्ट कर देता है। फिर धर्म से रहित मनुष्य अभीष्ट गति को प्राप्त नहीं करते। ॥8॥
 
Anger destroys the Dharma (righteousness) earned by the seekers with great pain. Then the devoid of Dharma (righteousness) people do not attain the desired destination. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)