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mahabharat 1.42.6: (परन्तु यह क्रोध धर्म का नाश करने वाला है।) अतः हे धर्मात्मा पुत्रों में श्रेष्ठ! तुम्हारे बचपन और साहसिक कार्यों को देखकर मुझे तुम्हें कुछ समय तक उपदेश देने की आवश्यकता अनुभव हो रही है।॥6॥   |   mahabharat अध्याय 1.42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.42.6 
सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वयि धर्मभृतां वर।
पुत्रत्वं बालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
(परन्तु यह क्रोध धर्म का नाश करने वाला है।) अतः हे धर्मात्मा पुत्रों में श्रेष्ठ! तुम्हारे बचपन और साहसिक कार्यों को देखकर मुझे तुम्हें कुछ समय तक उपदेश देने की आवश्यकता अनुभव हो रही है।॥6॥
 
(But this anger is the destroyer of Dharma.) Therefore, O best of the virtuous sons! Seeing your childhood and your daring deeds, I feel the need to preach you for some time. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)