श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  1.42.36-37 
तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षक: काश्यपं पथि।
गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वयोऽतिग:॥ ३६॥
तमब्रवीत् पन्नगेन्द्र: काश्यपं मुनिपुङ्गवम्।
क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
मार्ग में सर्पराज तक्षक ने कश्यप जी को देखा। वे एकनिष्ठ मन से हस्तिनापुर की ओर बढ़ रहे थे। तब सर्पराज तक्षक ने वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके कश्यप ऋषि से पूछा - 'आप इतनी शीघ्रता से कहाँ जा रहे हैं और क्या कार्य करना चाहते हैं?'॥36-37॥
 
On the way, King of Snakes Takshak saw Kashyap. He was moving towards Hastinapur with a single minded mind. Then King of Snakes disguised himself as an old Brahmin and asked the sage Kashyap – ‘Where are you going in such a hurry and what work do you want to do?’॥ 36-37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)