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mahabharat 1.42.25: शमीक ऋषि की दयालुता और उनके प्रति अपने द्वारा किये गये अपराध का विचार करते हुए वह अधिकाधिक दुःखी हो गया।   |   mahabharat अध्याय 1.42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.42.25 
अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च।
पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत् किल्बिषं मुने:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
शमीक ऋषि की दयालुता और उनके प्रति अपने द्वारा किये गये अपराध का विचार करते हुए वह अधिकाधिक दुःखी हो गया।
 
Thinking of the kindness of the sage Shamika and the offence he had committed against him, he became more and more distressed. 25.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)