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mahabharat 1.42.2: पिताजी! मैं आपसे सत्य कहता हूँ, अब यह शाप टल नहीं सकता। मैं तो मजाक में भी झूठ नहीं बोलता, फिर किसी को शाप देते समय झूठ कैसे बोल सकता हूँ?॥2॥   |   mahabharat अध्याय 1.42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.42.2 
नैवान्यथेदं भविता पितरेष ब्रवीमि ते।
नाहं मृषा ब्रवीम्येवं स्वैरेष्वपि कुत: शपन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
पिताजी! मैं आपसे सत्य कहता हूँ, अब यह शाप टल नहीं सकता। मैं तो मजाक में भी झूठ नहीं बोलता, फिर किसी को शाप देते समय झूठ कैसे बोल सकता हूँ?॥2॥
 
Father! I am telling you the truth, now this curse cannot be averted. I do not lie even in jest, then how can I lie while cursing someone?॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)