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mahabharat 1.42.13-14: उग्रश्रवाजी कहते हैं - उत्तम व्रतों का पालन करने वाले दयालु एवं महातपस्वी शमीक मुनि ने अपने एकाग्रचित्त एवं सुसंस्कारी गौरमुख नामक शिष्य को आज्ञा देकर उत्तम प्रश्न, कर्म और कथा का संदेश लेकर राजा परीक्षित के पास भेजा ॥13-14॥   |   mahabharat अध्याय 1.42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  1.42.13-14 
सौतिरुवाच
एवमादिश्य शिष्यं स प्रेषयामास सुव्रत:।
परिक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपा:॥ १३॥
संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च।
शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - उत्तम व्रतों का पालन करने वाले दयालु एवं महातपस्वी शमीक मुनि ने अपने एकाग्रचित्त एवं सुसंस्कारी गौरमुख नामक शिष्य को आज्ञा देकर उत्तम प्रश्न, कर्म और कथा का संदेश लेकर राजा परीक्षित के पास भेजा ॥13-14॥
 
Ugrashravaji says - The kind and great ascetic Shamik Muni, who observes the best fasts, ordered his concentrated and well-mannered disciple named Gaurmukh and sent him to King Parikshit with the message of good questions, action and story. 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)