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mahabharat 1.42.10: अतः अपनी इन्द्रियों को सदैव वश में रखो और क्षमाशील बनो। क्षमा से ही तुम ब्रह्माजी के समीपवर्ती लोकों में जा सकोगे॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 42: शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित् के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.42.10 
तस्माच्चरेथा: सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रिय:।
क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मण: समनन्तरान्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अतः अपनी इन्द्रियों को सदैव वश में रखो और क्षमाशील बनो। क्षमा से ही तुम ब्रह्माजी के समीपवर्ती लोकों में जा सकोगे॥10॥
 
Therefore, always keep your senses under control and be forgiving. Only with forgiveness will you be able to go to the worlds near Brahmaji. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)