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mahabharat 1.41.33: तूने बिना सोचे-समझे यह पाप क्यों किया? बेटा! राजा हमारे शाप के योग्य नहीं है। 33.   |   mahabharat अध्याय 1.41: शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 41: शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.41.33 
कस्मादिदं त्वया बाल्यात् सहसा दुष्कृतं कृतम्।
न ह्यर्हति नृप: शापमस्मत्त: पुत्र सर्वथा॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
तूने बिना सोचे-समझे यह पाप क्यों किया? बेटा! राजा हमारे शाप के योग्य नहीं है। 33.
 
Why did you foolishly commit this sin without thinking? Son! The king is not worthy of being cursed by us. 33.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिच्छापे एकचत्वा रिंशोऽध्याय:॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-शापविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)