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mahabharat 1.41.28: दण्ड से भय उत्पन्न होता है, फिर भय से तुरन्त शांति स्थापित हो जाती है। जो चोर के भय से व्याकुल रहता है, वह धर्म का अनुष्ठान नहीं कर सकता। वह व्याकुल मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध आदि शास्त्रीय अनुष्ठान भी नहीं कर सकता। 28॥   |   mahabharat अध्याय 1.41: शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 41: शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित् को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.41.28 
दण्डात् प्रतिभयं भूय: शान्तिरुत्पद्यते तदा।
नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
दण्ड से भय उत्पन्न होता है, फिर भय से तुरन्त शांति स्थापित हो जाती है। जो चोर के भय से व्याकुल रहता है, वह धर्म का अनुष्ठान नहीं कर सकता। वह व्याकुल मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध आदि शास्त्रीय अनुष्ठान भी नहीं कर सकता। 28॥
 
Punishment creates fear, then fear immediately establishes peace. He who is troubled by the fear of a thief cannot perform the rituals of Dharma. That disturbed man cannot even perform the classical rituals like Yagya, Shraddha etc. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)