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mahabharat 1.40.9: वे ब्रह्मचारी थे। वे सदैव तपस्या में लीन रहते थे। वे नियमित रूप से वेदों का अध्ययन करते थे। उन्हें किसी भी वस्तु का भय नहीं था। वे सदैव अपने मन और इंद्रियों को वश में रखते थे। महात्मा जरत्कारु सम्पूर्ण जगत में विचरण करते थे; परन्तु उनके मन में कभी किसी स्त्री की इच्छा नहीं हुई॥9॥   |   mahabharat अध्याय 1.40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.40.9 
स तूर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्त:
स्वाध्यायवान् वीतभय: कृतात्मा।
चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा
न चापि दारान् मनसाध्यकाङ्क्षत॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
वे ब्रह्मचारी थे। वे सदैव तपस्या में लीन रहते थे। वे नियमित रूप से वेदों का अध्ययन करते थे। उन्हें किसी भी वस्तु का भय नहीं था। वे सदैव अपने मन और इंद्रियों को वश में रखते थे। महात्मा जरत्कारु सम्पूर्ण जगत में विचरण करते थे; परन्तु उनके मन में कभी किसी स्त्री की इच्छा नहीं हुई॥9॥
 
He was a celibate. He was always engaged in penance. He regularly studied the Vedas. He had no fear of anything. He always kept his mind and senses under control. Mahatma Jaratkaru roamed the whole world; but he never desired a woman in his mind.॥9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)