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mahabharat 1.40.8: तदनन्तर बहुत समय बीत जाने पर भी अत्यन्त बुद्धिमान् ऋषि जरत्कारु कठोर व्रत धारण करके केवल तप करते रहे। उन्हें पत्नी की इच्छा नहीं थी ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 1.40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.40.8 
अथ कालस्य महत: स मुनि: संशितव्रत:।
तपस्यभिरतो धीमान् स दारान् नाभ्यकाङ्क्षत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर बहुत समय बीत जाने पर भी अत्यन्त बुद्धिमान् ऋषि जरत्कारु कठोर व्रत धारण करके केवल तप करते रहे। उन्हें पत्नी की इच्छा नहीं थी ॥8॥
 
Thereafter, even after a long period of time had passed, the extremely intelligent sage Jaratkaru, who was observing a strict vow, continued to do penance only. He did not desire to have a wife. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)