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mahabharat 1.40.5: जब उग्रश्रवाजी ने ऐसा कहा, तब धर्मात्मा शौनक हँस पड़े और फिर उग्रश्रवाजी को संबोधित करके बोले, 'आप जो कह रहे हैं, वह ठीक है।'॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.40.5 
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनक: प्राहसत् तदा।
उग्रश्रवासमामन्त्र्य उपपन्नमिति ब्रुवन्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जब उग्रश्रवाजी ने ऐसा कहा, तब धर्मात्मा शौनक हँस पड़े और फिर उग्रश्रवाजी को संबोधित करके बोले, 'आप जो कह रहे हैं, वह ठीक है।'॥5॥
 
When Ugrasravaji said this, the virtuous Shaunak burst out laughing and then addressed Ugrasravaji and said, 'What you are saying is correct.'॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)