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mahabharat 1.40.30: जब कभी ब्रह्मविद्या में निपुण और तपस्वी हमारे समान ऋषियों के पुत्र बातें कर रहे हों, तब तुम्हें वहाँ कुछ नहीं कहना चाहिए ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 1.40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.40.30 
व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म किंचिद् वचो वद।
अस्मद्विधेषु सिद्धेषु ब्रह्मवित्सु तपस्विषु॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जब कभी ब्रह्मविद्या में निपुण और तपस्वी हमारे समान ऋषियों के पुत्र बातें कर रहे हों, तब तुम्हें वहाँ कुछ नहीं कहना चाहिए ॥30॥
 
Whenever sons of sages like us, who are adept in the science of Brahman and who are ascetics, are talking, you should not say anything there. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)