श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  1.40.3-4 
सौतिरुवाच
जरेति क्षयमाहुर्वै दारुणं कारुसंज्ञितम्।
शरीरं कारु तस्यासीत्तत् स धीमाञ्छनै: शनै:॥ ३॥
क्षपयामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते।
जरत्कारुरिति ब्रह्मन् वासुकेर्भगिनी तथा॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी बोले - शौनकजी! हम कहते हैं कि क्षायको और करु शब्द दारुणक के ही शब्द हैं। पहले उसका शरीर करु अर्थात् अत्यन्त बलवान था। परम बुद्धिमान महर्षि ने घोर तप करके उसे धीरे-धीरे दुर्बल कर दिया। ब्रह्मन्! इसीलिए उसका नाम जरत्कारु पड़ा। इसी कारण वासुकिकी की बहन का नाम भी जरत्कारु पड़ा। 3-4॥
 
Ugrashravaji said – Shaunakji! Let us say that the word Kshayko and Karu are the words of Darunaka. Earlier his body was Karu i.e. very strong. The most intelligent Maharishi gradually weakened him through intense penance. Brahman! That's why he was named Jaratkaru. This was the reason for Vasukiki's sister also being named Jaratkaru. 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)