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mahabharat 1.40.22: उन्होंने राजा को कुछ भी भला-बुरा नहीं कहा। उन्हें इस अवस्था में देखकर राजा परीक्षित ने क्रोध त्याग दिया और दुःखी तथा पश्चाताप करते हुए अपनी राजधानी लौट गए। ऋषि वैसे ही बैठे रहे।   |   mahabharat अध्याय 1.40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.40.22 
न स किंचिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाशुभम्।
स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम्।
दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वासीत् तथैव स:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने राजा को कुछ भी भला-बुरा नहीं कहा। उन्हें इस अवस्था में देखकर राजा परीक्षित ने क्रोध त्याग दिया और दुःखी तथा पश्चाताप करते हुए अपनी राजधानी लौट गए। ऋषि वैसे ही बैठे रहे।
 
He did not say anything good or bad to the king. Seeing him in this state, King Parikshit gave up his anger and went back to his capital, grieved and repenting. The sage remained sitting as he was.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)