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mahabharat 1.40.15-16: उसके द्वारा घायल किया हुआ मृग वन में कभी जीवित नहीं रहता था; परन्तु आज महाराज परीक्षित के द्वारा घायल किया हुआ मृग, जो तुरन्त ही लुप्त हो गया था, वास्तव में उनकी मृत्यु का ठोस कारण था। राजा परीक्षित उस मृग के साथ बहुत दूर तक घसीटे गये ॥ 15-16॥   |   mahabharat अध्याय 1.40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  1.40.15-16 
न हि तेन मृगो विद्धो जीवन् गच्छति वै वने।
पूर्वरूपं तु तत्तूर्णं सोऽगात् स्वर्गगतिं प्रति॥ १५॥
परिक्षितो नरेन्द्रस्य विद्धो यन्नष्टवान् मृग:।
दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपति:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
उसके द्वारा घायल किया हुआ मृग वन में कभी जीवित नहीं रहता था; परन्तु आज महाराज परीक्षित के द्वारा घायल किया हुआ मृग, जो तुरन्त ही लुप्त हो गया था, वास्तव में उनकी मृत्यु का ठोस कारण था। राजा परीक्षित उस मृग के साथ बहुत दूर तक घसीटे गये ॥ 15-16॥
 
The deer wounded by him never used to survive in the forest; but today the deer wounded by Maharaj Parikshit which had instantly disappeared was actually the concrete reason for his death. King Parikshit was dragged along with that deer for a long distance.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)