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mahabharat 1.40.14: जैसे भगवान रुद्र आकाश में मृगशिरा नक्षत्र को भेदकर उसे खोजने के लिए हाथ में धनुष लेकर इधर-उधर घूमते थे, उसी प्रकार परीक्षित भी इधर-उधर घूम रहे थे॥14॥   |   mahabharat अध्याय 1.40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 40: जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित् का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दु:खी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.40.14 
यथैव भगवान् रुद्रो विद्‍ध्वा यज्ञमृगं दिवि।
अन्वगच्छद् धनुष्पाणि: पर्यन्वेष्टुमितस्तत:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जैसे भगवान रुद्र आकाश में मृगशिरा नक्षत्र को भेदकर उसे खोजने के लिए हाथ में धनुष लेकर इधर-उधर घूमते थे, उसी प्रकार परीक्षित भी इधर-उधर घूम रहे थे॥14॥
 
Just as Lord Rudra roamed here and there with a bow in his hand after piercing the Mrigashira constellation in the sky to find it, Parikshit was also roaming around in the same way. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)