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श्लोक 1.39.9  |
तत् करोत्वेष नागेन्द्र: प्रा प् तकालं वच: स्वयम्।
विनशिष्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिण:॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| समय आने पर इस नागराज को स्वयं वैसा ही करना चाहिए। जनमेजय के यज्ञ में केवल पापी सर्प ही नष्ट होंगे, धर्मात्मा सर्प नहीं। 9॥ |
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| This Nagraj himself should act accordingly when the time comes. Only the sinful snakes will be destroyed in the Yajna of Janmejaya, but not the righteous ones. 9॥ |
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