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mahabharat 1.39.7: हे प्रभु! सर्पराज वासुकि हमारे शुभचिंतक हैं और सदैव हमारे प्रिय कार्यों में लगे रहते हैं; अतः आप उन पर कृपा करें और उनके मन में जल रही चिंता की अग्नि को बुझा दें।   |   mahabharat अध्याय 1.39: ब्रह्माजीकी आज्ञासे वासुकिका जरत्कारु मुनिके साथ अपनी बहिनको ब्याहनेके लिये प्रयत्नशील होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 39: ब्रह्माजीकी आज्ञासे वासुकिका जरत्कारु मुनिके साथ अपनी बहिनको ब्याहनेके लिये प्रयत्नशील होना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.39.7 
हितो ह्ययं सदास्माकं प्रियकारी च नागराट्।
प्रसादं कुरु देवेश शमयास्य मनोज्वरम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! सर्पराज वासुकि हमारे शुभचिंतक हैं और सदैव हमारे प्रिय कार्यों में लगे रहते हैं; अतः आप उन पर कृपा करें और उनके मन में जल रही चिंता की अग्नि को बुझा दें।
 
'O Lord! King of snakes Vasuki is our well-wisher and is always engaged in our favourite work; therefore, please be kind to him and extinguish the fire of worry burning in his mind.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)