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mahabharat 1.38.3: हे राजन! इस संसार में भाग्य से पीड़ित मनुष्य को भाग्य की ही शरण लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त और कोई शरण उपयोगी नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 1.38: वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 38: वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.38.3 
दैवेनोपहतो राजन् यो भवेदिह पूरुष:।
स दैवमेवाश्रयते नान्यत् तत्र परायणम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! इस संसार में भाग्य से पीड़ित मनुष्य को भाग्य की ही शरण लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त और कोई शरण उपयोगी नहीं है।
 
‘O King! In this world, a man who is afflicted by the fate must seek refuge in the fate only. There is no other refuge of any use.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)