Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.38.18-19: अतः हे सर्पराज वासुके! मैं सोचता हूँ कि आपको अपनी जरत्कारु नामक बहन को महर्षि जरत्कारु को भिक्षा में दे देना चाहिए, जो सर्पों के भय को दूर करने के लिए पुत्री की याचना करते हैं तथा महान व्रत रखते हैं। उस शाप से मुक्ति पाने के लिए मैंने यही उपाय सुना है। | mahabharat अध्याय 1.38: वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अतः हे सर्पराज वासुके! मैं सोचता हूँ कि आपको अपनी जरत्कारु नामक बहन को महर्षि जरत्कारु को भिक्षा में दे देना चाहिए, जो सर्पों के भय को दूर करने के लिए पुत्री की याचना करते हैं तथा महान व्रत रखते हैं। उस शाप से मुक्ति पाने के लिए मैंने यही उपाय सुना है।
Therefore, O King of Snakes, Vasuke! I think that you should offer your sister named Jaratkaru as alms to Maharshi Jaratkaru, who begs for a daughter and observes a great fast, to remove the fear of snakes. This is the remedy I have heard to get rid of that curse.
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि एलापत्रवाक्ये अष्टत्रिंशोऽध्याय:॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें एलापत्र-वाक्यसम्बन्धी अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥