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mahabharat 1.38.10: जनमेजय के सर्पयज्ञ में केवल वे ही सर्प नष्ट होंगे जो मनुष्यों को बार-बार डसते हैं, नीच स्वभाव वाले, पापी और तीव्र विष वाले हैं। परन्तु जो पुण्यात्मा हैं, वे नष्ट नहीं होंगे॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.38: वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 38: वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.38.10 
ये दन्दशूका: क्षुद्राश्च पापाचारा विषोल्बणा:।
तेषां विनाशो भविता न तु ये धर्मचारिण:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय के सर्पयज्ञ में केवल वे ही सर्प नष्ट होंगे जो मनुष्यों को बार-बार डसते हैं, नीच स्वभाव वाले, पापी और तीव्र विष वाले हैं। परन्तु जो पुण्यात्मा हैं, वे नष्ट नहीं होंगे॥10॥
 
In the snake sacrifice of Janamejaya, only those snakes will be destroyed who often bite people, are mean-natured, sinful and have strong venom. But those who are virtuous will not be destroyed.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)